46 ग्रंथ
भगवती आराधना (आ. श्री शिवकोटी स्वामी जी)
भावत्रयफलप्रदर्शी (आ. श्री कुंथुसागर जी)
प्रस्तुत ग्रंथ "भावत्रयफलप्रदर्शी" में विस्तार के साथ अशुभोपयोग से प्राप्त होने वाले विविध प्रकार के दुखों का वर्णन किया है। किस प्रकर का कार्य करने से कौन से कर्म का बंध होता है। वर्तमान काल में प्रत्यक्ष ज्ञानी नहीं हैं किंतु उनकी वाणी हमारे पास है जिसके माध्यम से जाना जा सकता है कि जीव ने पूर्व भव में अच्छे कर्म किए हैं या बुरे कर्म? इसका वर्णन ग्रंथराज में विस्तार के साथ लिखा है। कर्नाटक में जन्मे आचार्य श्री कुंथुसागर जी ने संस्कृत भाषा में विपुल मात्रा में जैन वांग्मय की रचना की है।
मरणकण्डिका (आ. श्री अमितगति स्वामी जी)
मूलाचार प्रदीप (आ. श्री सकलकीर्तिस्वामी जी)
योगसार (भाग 1, 2) (आचार्य श्री अमितगति जी)
योगामृत (भाग 1-2) (मुनि श्रीबालचन्द्र जी)
रयणसार (आ. श्री कुंदकुंद स्वामी)
प्रस्तुत "रयणसार" ग्रन्थ में आचार्य कुंदकुंद देव द्वारा ध्यान, चर्या आदि को 167 गाथाओं के माध्यम से रचा गया है। सरल चिंतन युक्त हिंदी भाषा में प्राकृत गाथाओं को अनुवादित किया गया है। श्रावक और श्रमण दोनों के धर्मों का संक्षेप में अति उत्तम तरीके से कथन किया है।
वसुऋद्धि
आचार्य भगवन् श्री वसुनंदी जी मुनिराज द्वारा संकलित एवं संपादित इस लघु काय कृति "वसुऋद्धि" में आचार्य श्री शिवकोटी जी मुनिराज द्वारा रचित 'रत्नमाला', आचार्य श्री पूज्यपाद स्वामी जी द्वारा रचित 'पूज्यपाद श्रावकाचार' व 'इष्टोपदेश', आचार्य श्री योगिन्दु देव जी द्वारा रचित 'ज्ञानांकुश', आचार्य श्री विशाल कीर्ति जी द्वारा रचित 'वैराग्यमणिमाला', आचार्य श्री अकलंक देव जी द्वारा रचित 'स्वरूप संबोधन', आचार्य श्री नेमिचन्द जी सूरि जी द्वारा रचित 'लघु द्रव्य संग्रह' तथा श्री प्रभाचंद्राचार्य जी द्वारा रचित 'अर्हत प्रवचनम्' अर्थ सहित समाहित हैं। कुछ उपलब्ध कुछ अनुपलब्ध दुर्लभ कृतियों का समावेश इस कृति की महत्ता को बढ़ाता है।
वसुऋद्धि — अर्हत् प्रवचनम् (आ. श्री प्रभाचंद्र स्वामी जी)
वसुऋद्धि — इष्टोपदेश (आ. श्री पूज्यपाद स्वामी जी)
वसुऋद्धि — ज्ञानांकुश (आ. श्री योगीन्द्र देव)
वसुऋद्धि — पूज्यपाद श्रावकाचार (आ. श्री पूज्यपाद स्वामी जी)
वसुऋद्धि — रत्नमाला (आ. श्री शिवकोटि स्वामी जी)
वसुऋद्धि — लघु द्रव्य संग्रह (आ. श्री नेमिचंद्र स्वामी जी)
वसुऋद्धि — वैराग्यमणिमाला (आ. श्री विशालकीर्ति जी)
वसुऋद्धि — स्वरूप संबोधन (आ. श्री अकलंक देव जी)
विषापहार स्तोत्र (महाकवि धनंजय)
समाधि तंत्र (आ. श्री पूज्यपाद स्वामी जी)
समाधि सार (आ. श्री सोमदेव स्वामी जी)
श्री सोमसेनाचार्य कृत "समाधि सार" नामक ग्रंथ में 200 श्लोक निबद्ध हैं।यह ग्रंथ वस्तुत: समाधि साधना हेतु सारभूत ग्रंथ है। यह संस्कृत भाषा में लिखा गया है। ग्रंथ सरल, सुबोध और सारगर्भित है। समाधि की साधना प्रत्येक भव्य का परम और चरम लक्ष्य है, जिसे प्राप्त करने में यह ग्रंथ सहायक है।
