46 ग्रंथ
आध्यात्म तरंगिणी (आचार्य सोमदेव सूरी जी)
आराधना समुच्चय (श्री रविचन्द्राचार्य)
आराधना सार (श्रीमद्देवसेनाचार्य जी)
कर्म विपाक (आ. श्री सकलकीर्ति जी)
कर्मप्रकृति (सिद्धांतचक्रवर्ती आ. श्री अभयचंद्र जी)
सिद्धांत चक्रवर्ती आचार्य श्री अभयचंद्र जी द्वारा रचित प्रस्तुत कृति "कर्म प्रकृति" में बंध आदि विषयों का वर्णन सरल, सुबोध और सहज भाषा में किया गया है। प्रारंभिक अध्येता या विद्यार्थी विशेष सहयोग के बिना भी इसमें स्वयं प्रवेश पा सकते हैं। संस्कृत भाषा का साधारण जानकार भव्य जीव भी इस कृति से जैन धर्म के सिद्धांतों की पर्याप्त जानकारी प्राप्त कर सकता है।
गुणरत्नाकर (रत्नकरण्ड श्रावकाचार) (आ. श्री समंतभद्र स्वामी जी)
प्रस्तुत ग्रंथ "गुण रत्नाकर (रत्नकरण्ड श्रावकाचार)" लगभग 2000 साल पहले आचार्य श्री समंतभद्र स्वामी जी द्वारा रचित है जो श्रावकों की चर्या का वर्णन करता है। इस ग्रंथ में कुल 150 श्लोकों के माध्यम से संस्कृत को सरलता से हिंदी में समझाते हुए श्रावकों को अनुकूल चर्या का पालन करने का संकेत किया है। सुप्रसिद्ध रत्नकरण्ड श्रावकाचार की बहुपयोगिता को देखते हुए ग्रंथ का प्रकाशन सरल अर्थ के साथ किया गया है।
चार श्रावकाचार संग्रह
प्रस्तुत कृति "चार श्रावकाचार" के नाम से ही स्पष्ट होता है कि इसमें 4 श्रावकाचारों को सम्मिलित किया गया है। रत्नकरण्ड श्रावकाचार, चारित्रसार गत श्रावकाचार, कार्तिकेयानुप्रेक्षा गत श्रावकाचार और वसुनन्दी श्रावकाचार। इन 4 श्रावकाचारों का भव्य प्राणियों को निश्चित ही स्वाध्याय करना चाहिए एवं श्रावकपने को अंगीकार करने हेतु स्वीकार करना चाहिए। ये कृति श्रावकों के लिए बहुपयोगी लघु काय में प्रस्तुत की है।
जिन श्रमण भारती (संकलन — भक्ति, स्तुति, ग्रंथादि)
जिन सहस्रनाम स्तोत्र
जिनकल्पि सूत्र (श्री प्रभाचंद्राचार्य)
तच्चा-वियारो सारो (आ. श्री वसुनंदी जी)
प्रस्तुत ग्रंथ "तच्च वियारो सारो" में 295 गाथाओं के माध्यम से णमोकार महात्म्य ,धर्म, सम्यक्त्व आदि के फल को बताया गया है। काव्य सरल व परोपकार की भावना से युक्त हैं। प्रस्तुत कृति प्राचीन आचार्य श्री वसुनंदी जी की अनमोल व अनुपम कृति है। जिसका सरल व बोधप्रद अन्वयार्थ सभी भव्य जीवों के लिए ज्ञान वृद्धि व आत्मरसामृत के पान कराने में पूर्ण सक्षम है। जिसका स्वाध्याय सभी के करने योग्य है।
तत्त्वज्ञान तरंगिणी (श्री मद्भट्टारक ज्ञानभूषण जी)
तत्त्वार्थ सार (श्री मद्मृतचन्द्राचार्य सूरि)
तत्त्वार्थ सूत्र (आ. श्री उमास्वामी जी)
तत्त्वार्थस्य संसिद्धि
धम्म-रसायणं (आ. श्री पद्मनंदी स्वामी जी)
प्रस्तुत कृति "धम्म रसायणं" में आत्मा को परमात्मा बनाने की रासायनिक प्रक्रिया बताई है। प्रस्तुत रचना संसार जीवों पर एक स्तुत्य उपकार है तथा इस ग्रंथ का भाषानुवाद आचार्य भरत सागर जी ने किया है। आत्मा की अवस्था कैसे प्राप्त हो इस पर प्रकाश डाला है। प्रस्तुत ग्रन्थ में मूल गाथा उसका अन्वयार्थ और हिंदी अनुवाद सरल व सहज ही दृष्टिगोचर होते हुए प्रत्येक जीव के ज्ञान को विकसित करने के साथ -साथ आत्म शुद्धि के उपाय करने की भावना को जागृत करेगा , अतः इसका स्वाध्याय अवश्य करणीय है।
धर्म रत्नाकर (श्री जयसेनाचार्य जी)
ध्यान-सूत्राणि (श्री माघनंदी सूरी)
नीतिसारसमुच्चय (आ. श्री इंद्रनंदीस्वामी जी)
पंच विंशतिका (आ. श्री पद्मनंदी जी)
पंचरत्न
प्रस्तुत कृति "पंचरत्न" में प्रश्नोत्तर रत्नमालिका, मृत्यु महोत्सव, परमानंद स्तोत्र, ज्ञानसार एवं लघुशांति सुधा सिंधु- इन 5 लघु काय ग्रंथों को संग्रह किया गया है, इससे इसका पंचरत्न नाम सार्थक होता है। अत्यल्प काय ग्रंथ, महा सार गर्भित अर्थ को बताने वाले हैं जिनका अन्वयार्थ और अनुवाद बालकों के लिए भी सहजगम्य है।
