णमो अरिहंताणं · णमो सिद्धाणं · णमो आइरियाणं · णमो उवज्झायाणं · णमो लोए सव्वसाहूणं
निर्ग्रन्थ ग्रंथमालासमिति (पंजीकृत) निवेदन करें

परिचय — श्रुत-सेवा

जिनशासन की अविनश्वर परंपरा का दिव्य अभियान

अनादिकाल से तीर्थंकर जिनेन्द्रों की दिव्यध्वनि ने असंख्य जीवों के जीवन में सम्यग्दर्शन,
सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र का प्रकाश फैलाया है। वही दिव्य वाणी आचार्यों, उपाध्यायों और
मनीषियों की परंपरा से शास्त्रों के रूप में सुरक्षित रही। यदि जिनप्रतिमा जिनेन्द्र भगवान का
दृश्य स्वरूप है, तो श्रुत ही जिनेन्द्र भगवान का वाङ्मय स्वरूप है। यही श्रुत युगों-युगों तक
धर्म की धारा को प्रवाहित रखता है, समाज को संस्कारित करता है और भव्य जीवों को
मोक्षमार्ग की दिशा प्रदान करता है।

इतिहास साक्षी है कि जब-जब श्रुत की रक्षा हुई, तब-तब जिनशासन की पताका विश्व
में गौरव के साथ फहराई गई। और जब-जब शास्त्रों की उपेक्षा हुई, तब-तब धर्म का प्रकाश
मंद पड़ने लगा।

नश्यत्येव ध्रुवं सर्वं श्रुताभावेऽत्र शासनम्।
तस्मात् सर्व प्रयत्नेन श्रुतसारं समुद्धरेत्॥63॥ — प्रबोधसार, आ. यश. कीर्ति

आज शासन श्रुत के अभाव में नष्ट हो जाएगा, इसलिए समपूर्ण प्रकार से जितना भी श्रुत
है उसका संवर्द्धन करना चाहिए। इसलिए हमारे आचार्यों ने कहा है कि श्रुत की आराधना ही
जिनशासन की आराधना है, और शास्त्रों का संरक्षण ही संस्कृति का संरक्षण है।

इसी दिव्य भावना को अपने जीवन का व्रत बनाकर अखिल भारतवर्षीय निर्ग्रन्थ ग्रंथमाला
समिति (पंजीकृत) पिछले लगभग पच्चीस वर्षों से अखण्ड भाव से श्रुत-सेवा के इस महायज्ञ
में समर्पित है। यह केवल एक संस्था नहीं, बल्कि जिनवाणी के प्रचार-प्रसार का एक जीवंत
अभियान है; एक ऐसा पवित्र संकल्प है, जिसने ज्ञान को व्यापार नहीं, बल्कि उपकार माना
है; जिसने शास्त्रों को वस्तु नहीं, बल्कि वीतराग प्रभु की चैतन्य निधि समझा है।

इस पावन संस्था की स्थापना परम पूज्य प्राकृत भाषा चक्रवर्ती, अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोगी, आचार्य
भगवन् गुरुवर श्री वसुनंदी जी मुनिराज के करकमलों से हुई। वे केवल एक आचार्य नहीं, बल्कि
स्वयं में एक चलता-फिरता सम्यग्ज्ञान का महाविद्यालय हैं। सौ से अधिक प्राकृत ग्रंथों के रचयिता,
गहन अध्ययन और निरंतर ज्ञानोपयोग में रत, उनका व्यक्तित्व श्रुतभक्ति और ज्ञानसाधना का अद्वितीय
संगम है। उनका यह दिव्य योगदान ही इस संस्था की आत्मा है और इसकी प्रत्येक सेवा में उनकी
प्रेरणा स्पंदित होती है।

आज जब संसार का अधिकांश भाग ज्ञान को भी व्यवसाय का माध्यम बना चुका है,
तब यह संस्था एक अद्वितीय आदर्श प्रस्तुत करती है। संभवतः सम्पूर्ण भारतवर्ष में यह इस
प्रकार की विरल संस्था है, जिसने आज तक अपने द्वारा प्रकाशित किसी भी शास्त्र का मूल्य
निर्धारित नहीं किया। यहाँ न कोई विक्रय है, न कोई व्यापार। जो भी श्रद्धापूर्वक ज्ञान प्राप्त
करना चाहता है, उसके लिए संस्था के द्वार समान रूप से खुले हैं।

कोई एक ग्रंथ चाहे, कोई दस चाहे, कोई सैकड़ों ग्रंथ समाज में सम्यग्ज्ञान प्रचार के लिए
ले जाना चाहे—संस्था बिना किसी मूल्य के उन्हें उपलब्ध कराती है। इतना ही नहीं, अनेक
अवसरों पर प्रेषण (कूरियर) का व्यय भी स्वयं वहन करती है। यह सेवा किसी व्यक्ति, क्षेत्र,
भाषा, सम्प्रदाय या वर्ग तक सीमित नहीं है; जहाँ भी श्रुत की प्यास है, वहाँ तक जिनवाणी
पहुँचाना ही इसका ध्येय है।

पिछले लगभग पच्चीस वर्षों में संस्था के माध्यम से चार सौ से अधिक प्रकार के शास्त्रों
एवं धर्मग्रंथों का प्रकाशन हो चुका है। इन ग्रंथों ने न केवल देश के कोने-कोने में अध्ययन
की परंपरा को सशक्त किया है, बल्कि अनगिनत परिवारों में धर्मचिंतन, स्वाध्याय, संस्कार
और आत्मजागरण की ज्योति भी प्रज्वलित की है। यह संख्या केवल पुस्तकों की नहीं है; यह
उन असंख्य जीवनों की है, जिन्हें जिनवाणी ने दिशा दी, जिन्हें शास्त्रों ने संभाला और जिन्हें
आत्मकल्याण की प्रेरणा मिली।

इस संस्था का गौरव केवल इसके प्रकाशनों की संख्या नहीं है। इसका वास्तविक गौरव
इसकी निष्काम सेवा, पूर्ण पारदर्शिता, श्रुतभक्ति, समर्पण और अखंड विश्वास है। यह संस्था
हमें स्मरण कराती है कि शास्त्रों का दान किसी वस्तु का दान नहीं, बल्कि विवेक का दान
है; संस्कारों का दान है; आत्महित का दान है।

जिनशासन की परंपरा केवल मंदिरों से नहीं चलती, केवल प्रवचनों से नहीं चलती; वह
शास्त्रों से चलती है। आचार्य बदलते हैं, युग बदलते हैं, पीढ़ियाँ बदलती हैं; किन्तु श्रुत अमर
रहता है। वही आने वाली पीढ़ियों को धर्म से जोड़ता है, वही संस्कृति की रक्षा करता है और
वही मोक्षमार्ग का दीपक बनकर युगों तक प्रकाश देता रहता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो
यह समिति वास्तव में श्रुत परंपरा की एक सशक्त संवाहिका है।

यह पुस्तिका केवल प्रकाशित ग्रंथों की सूची नहीं है। यह पच्चीस वर्षों की साधना, सेवा,
त्याग, तप और श्रुतभक्ति का सजीव दस्तावेज है। इसका प्रत्येक पृष्ठ उस भावना का साक्षी है
कि यदि जिनवाणी जीवित रहेगी, तो जिनशासन का प्रकाश कभी मंद नहीं होगा।

हम समाज के प्रत्येक धर्मानुरागी, प्रत्येक स्वाध्यायी, प्रत्येक विद्वान, प्रत्येक युवा और
प्रत्येक परिवार से विनम्र निवेदन करते हैं कि वे इस महान ज्ञान-यज्ञ के सहभागी बनें। स्वयं
अध्ययन करें, दूसरों को अध्ययन के लिए प्रेरित करें, शास्त्रों का सम्मान करें और इस दिव्य
परंपरा को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने में अपना अमूल्य योगदान दें।