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साहित्य

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55 ग्रंथ

प्रभंजन चरित्र (कविवर ब्रह्मराय)

प्रभंजन चरित्र (कविवर ब्रह्मराय)

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प्रस्तुत ग्रंथ "प्रभंजन चरित्र" में पुण्य पाप के फल का विशद व्यख्यान, पिता पुत्र का स्नेह, पूर्वभव में बांधे गए बैर का प्रतिफल, स्त्री का स्वभाव, अणुव्रत-महाव्रत का महत्व, संसार की दशा इत्यादि विषयों का विस्तार से वर्णन कविवर ब्रह्मराय जी द्वारा किया गया है। देखने में तो बहुत छोटा सा ग्रंथ है किंतु इसमें वर्णित विषय संसार, शरीर-भोगों की यथार्थता का प्रतिबोधक है। वैराग्य की शिक्षा जीवंत उदाहरणों द्वारा दी गई है। नोट-यह ग्रंथ प्राचीन ग्रंथों में से एक है जिन्हें लुप्त होने के भय से पुनः प्रकाशित किया गया है।

भद्रबाहु चरित्र

भद्रबाहु चरित्र

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भरतेश वैभव (कवि रत्नाकर)

भरतेश वैभव (कवि रत्नाकर)

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मल्लिनाथ पुराण (आ. श्री सकलकीर्ति जी)

मल्लिनाथ पुराण (आ. श्री सकलकीर्ति जी)

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जैन धर्म के 19वें तीर्थंकर श्री मल्लिनाथ भगवान् के पावन जीवन चरित्र को आचार्य श्री सकलकीर्ति जी मुनिराज ने "श्री मल्लिनाथ पुराण" में 7 परिच्छेदों में निबद्ध किया है। ये ग्रंथ संस्कृत मूल का है किंतु यहां केवल हिंदी में प्रस्तुत किया गया है जिसमें श्री मल्लिनाथ भगवान् के पूर्व भव में राजा वैश्रवण, तपस्या, संयम, साधना एवम् तीर्थंकर प्रकृति के बंध में कारण भूत षोडशकारण भावना का उल्लेख भी किया है। भगवान् मल्लिनाथ स्वामी के पांचों कल्याणकों का वृहद् वर्णन रोचक, सुगम और बोधप्रद है।

महापुराण (भाग 1-2)

महापुराण (भाग 1-2)

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महावीर पुराण (आ. श्री सकलकीर्ति जी)

महावीर पुराण (आ. श्री सकलकीर्ति जी)

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महीपाल चरित्र (कविवर श्री चारित्र भूषण)

महीपाल चरित्र (कविवर श्री चारित्र भूषण)

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प्रस्तुत ग्रंथ में राजा महीपाल को नायक मानते हुए उनके जीवन चरित्र के माध्यम से धर्म की महिमा बतलाई है। कविराज चारित्र भूषण द्वारा रचित ये ग्रंथ सरल और संक्षेप में उपलब्ध है। इस ग्रंथ का स्वाध्याय चारों पुरुषार्थों की प्रेरणा देने वाला है और श्रावकों और श्रमणों के लिए अत्युपयोगी है।

मौनव्रत कथा (आ. श्री श्रीचंद्र स्वामी जी)

मौनव्रत कथा (आ. श्री श्रीचंद्र स्वामी जी)

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यशोधर चरित्र

यशोधर चरित्र

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यशोधर महाराज जिन्होंने आटे के मुर्गे की बलि दी। इस भाव हिंसा के कारण एवं मातृमोह के कारण सुदीर्घ काल तक नाना कुयोनियों में भ्रमण करते हुए शब्दातीत दुःखों को प्राप्त किया पुनः वे अभयकुमार एवं उनकी मां का जीव अभयमति के रूप में उत्पन्न हुए, मुनिराज से अपने पूर्व जन्म का वृतांत सुन विरक्त हो क्षुल्लक क्षुल्लिका बने बाद में उन्होंने अपने मामा को उपदेश देकर जैनधर्म में अनुरक्त कराया। यह शास्त्र आबालवृद्धों के लिए पठनीय है एवं हिंसादि पापों से विरक्ति का प्रेरक है।

रामचरित्र (भाग 1-2) (आ. श्री सोमदेव स्वामी)

रामचरित्र (भाग 1-2) (आ. श्री सोमदेव स्वामी)

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रोहिणी व्रत कथा

रोहिणी व्रत कथा

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वरांग चरित्र (आ. श्री जटासिंह नंदी)

वरांग चरित्र (आ. श्री जटासिंह नंदी)

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विमलनाथ पुराण (श्री ब्रह्मचारीश्वर कृष्णदास जी)

विमलनाथ पुराण (श्री ब्रह्मचारीश्वर कृष्णदास जी)

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ब्रह्मचारी कृष्णदास द्वारा रचित प्रस्तुत "विमलनाथ पुराण" 13वें तीर्थंकर श्री विमलनाथ जी के पूर्व भवों से लेकर वर्तमान भव तक वर्णन करते हुए उनके गुणों का गुणगान करता है। प्रस्तुत ग्रंथ को दस अध्यायों के माध्यम से प्रेषित किया गया है जिसमें चित्त को विशुद्ध करने वाली, निर्मल ध्यान को उत्पन्न करने वाली, ज्ञान और संयम-वैराग्य की उत्पत्ति में निमित्त बनने वाले चारित्रिक घटनाओं को सरल व सर्वोपयोगी शैली में वर्णन किया गया है।

वीर वर्धमान चरित्र

वीर वर्धमान चरित्र

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व्रत कथा संग्रह

व्रत कथा संग्रह

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शांतिनाथ पुराण (भाग 1-2) (कवि असग जी)

शांतिनाथ पुराण (भाग 1-2) (कवि असग जी)

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प्रस्तुत ग्रंथ "शांतिनाथ पुराण भाग-1" 16 वें तीर्थंकर श्री शांतिनाथ जी के जीवन पर आधारित है, जो उनके तीर्थंकर, कामदेव एवम् चक्रवर्ती पद के अनुकूल वर्णित है। ग्रंथ सरल हिंदी भाषा में रचित है। ये ग्रंथ दो भाग में उपलब्ध है। कविवर असग जी ने इस ग्रंथ में जैन सिद्धांतों के गूढ़तम रहस्यों का सूक्ष्म विश्लेषण, यथार्थ घटनाओं का वर्णन और संसार की दशाओं के दर्शायक संदर्भों का हृदयतल स्पर्शी-व्याख्यान किया है, साथ ही चारों अनुयोगों को अविनाभावी रूप से संलग्न किया है।

शांतिनाथ पुराण भाग-2

शांतिनाथ पुराण भाग-2

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प्रस्तुत ग्रंथ "शांतिनाथ पुराण भाग-2" 16 वें तीर्थंकर श्री शांतिनाथ जी के जीवन पर आधारित है, जो उनके तीर्थंकर, कामदेव एवम् चक्रवर्ती पद के अनुकूल वर्णित है। ग्रंथ सरल हिंदी भाषा में रचित है। ये ग्रंथ दो भाग में उपलब्ध है। कविवर असग जी ने इस ग्रंथ में जैन सिद्धांतों के गूढ़तम रहस्यों का सूक्ष्म विश्लेषण, यथार्थ घटनाओं का वर्णन और संसार की दशाओं के दर्शायक सन्दभोंस का हृदयतल स्पर्शी-व्याख्यान किया है, साथ ही चारों अनुयोगों को अविनाभावी रूप से संलग्न किया है।

श्री जम्बूस्वामी जी चरित्र (श्री वीर कवि)

श्री जम्बूस्वामी जी चरित्र (श्री वीर कवि)

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जम्बूस्वामी चरित्र श्री वीर कवि द्वारा रचित प्रस्तुत ग्रन्थ अंतिम अनुबद्ध केवली श्री जम्बूस्वामी जी पर आधारित है जिसमें उनके जीवन में उतर-चढ़ाव को सरल और अलंकारों से युक्त विशेषणों से दर्शाया है। जम्बूस्वामी और उनकी पत्नियों की कथा रूप में जो वार्ताएं हैं वे भव भिरुओं को वैराग्यवर्धक और रागियों को संसार का कारण हैं। ग्रंथ की शैली उपन्यास की तरह अत्यंत रोचक, तत्त्वबोध युक्त है जो वैराग्य का प्रबल निमित है।

श्रीपाल चरित्र (आ. श्री सकलकीर्ति जी)

श्रीपाल चरित्र (आ. श्री सकलकीर्ति जी)

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आचार्य सकलकीर्ति जी द्वारा रचित प्रस्तुत ग्रंथ "श्रीपाल चरित्र" श्रीपाल कामदेव के जीवन चरित्र का प्रत्यक्षवत् वर्णन करने वाला है। इसमें राजा श्रीकंठ के भव से लेकर श्रीपाल के मोक्ष तक का वर्णन अत्यंत सरल भाषा में किया गया है। इसके स्वाध्याय से भवभीरुता, पापों से विरक्ति, संसारिक भोगों के प्रति उदासीनता, शरीर के प्रति निर्ममत्व भाव, संयम की तीव्र पिपासा और आत्म-कल्याण की उत्सुकता प्रकट होती है।

श्रेणिक चरित्र

श्रेणिक चरित्र

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आचार्य श्री शुभचंद्र स्वामी जी द्वारा रचित प्रस्तुत ग्रंथ "श्रेणिक चरित्र" के 15 अध्यायों में भगवान महावीर स्वामी की धर्म सभा के प्रमुख श्रोता, भविष्य काल के प्रथम तीर्थंकर राजा श्रेणिक का जीवन चरित्र अत्यंत रोचक व मनोहारी है। ग्रंथकार ने अत्यंत सरल सुबोधक अध्यायों के विभाजन के साथ-साथ छोटी-छोटी घटनाओं को विषयभूत करके भी पाठकों को शास्त्र के सार से जोड़ दिया है। इसमें दृश्य बहुत ही छोटे-छोटे होने से रुचि बनाए रखने में सक्षम हैं जिसे पाठक उपन्यास की तरह पूरा पढ़े बिना विराम नहीं लेंगे।

सती मनोरमा

सती मनोरमा

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प्रस्तुत कृति सती मनोरमा पर आधारित नाटक से संबंधित है जो 3 अंकों में निबद्ध है। प्रथम अंक में 11 दृश्य, द्वितीय में भी 11 और तृतीय में कुल6 दृश्यों के माध्यम से सती मनोरमा पर नाटक दर्शाया गया है।

सप्तव्यसन चरित्र (आ. श्री सोमकीर्ति भट्टारक)

सप्तव्यसन चरित्र (आ. श्री सोमकीर्ति भट्टारक)

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आचार्य श्री सोमकीर्ति भट्टारक जी द्वारा रचित प्रस्तुत ग्रंथ "सप्त व्यसन चरित्र" के माध्यम से सप्त व्यसनों के विभिन्न दोषों और उनके त्याग के महत्व का सुंदर विवेचन विभिन्न कहानियों के माध्यम से किया गया है। इस ग्रंथ में सप्त व्यसनों का स्वरूप व कुख्यात अधम पुरुषों का जीवन चरित्र है, भाषा अत्यंत सरल, सहज व रोचक है। बालक से लेकर वृद्ध तक इसे आसानी से पढ़ सकते हैं। लघु काय होते हुए भी यह ग्रंथ अपने आप में अत्यंत महत्वपूर्ण है। व्यसनों में संलिप्त व्यक्तियों के लिए सन्मार्ग दर्शायक प्रकाश किरण के समान है तथा धर्म से पतित व्यक्तियों के लिए बैसाखी के समान है।

सम्यक्त्व कौमुदी

सम्यक्त्व कौमुदी

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प्रस्तुत ग्रंथ "सम्यक्त्व कौमुदी" में विभिन्न कहानियों के माध्यम से सम्यग्दर्शन के महत्व को दर्शाते हुए उसे प्राप्त करने की प्रेरणा दी है। भव सागर से पार होने के इच्छुक जीवों के लिए इस ग्रंथ में ग्रंथकार ने सम्यक्त्व उत्पत्ति की 8 कथाओं का जिस रोचक शैली से वर्णन किया है वैसा वर्णन अन्यत्र उपलब्ध नहीं है।

सीता चरित्र (श्री दयाचंद गोलीय)

सीता चरित्र (श्री दयाचंद गोलीय)

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