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साहित्य

ग्रंथ, प्रवचन, काव्य एवं टीका — पूर्णतः निःशुल्क

403 ग्रंथ

उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म (चेतना का भोग)

उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म (चेतना का भोग)

Hindi
उत्तम मार्दव धर्म (मान महाविष रूप)

उत्तम मार्दव धर्म (मान महाविष रूप)

Hindi
उत्तम शौच धर्म (लोभ पाप का बाप बखाना)

उत्तम शौच धर्म (लोभ पाप का बाप बखाना)

Hindi
उत्तम संयम धर्म (जिस बिना नहिं जिनराज सीझे)

उत्तम संयम धर्म (जिस बिना नहिं जिनराज सीझे)

Hindi
उत्तम सत्य धर्म (सतवादी जग में सुखी)

उत्तम सत्य धर्म (सतवादी जग में सुखी)

Hindi
उववासो (उपवास)

उववासो (उपवास)

Prakrit

परम पूज्य प्राकृतभाषा चक्रवर्ती, अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोगी "आचार्य श्री वसुनंदी जी" मुनिराज द्वारा रचित "उपवास" नामक प्राकृत भाषा का यह लघु किंतु सारगर्भित ग्रंथ १११ श्लोकों में रचित है। यह कृति उपवास को मात्र आहार त्याग नही बल्कि चित्त- शुद्धि और कर्म निर्जरा का कारण सिद्ध करती है। उपवास के विषय में इतना विस्तृत और सटीक वर्णन करने वाला यह प्रथम ग्रंथ है। सभी जाति, आम्नाय, संप्रदाय के लोगों के लिए यह ग्रंथ समान रूप से उपयोगी है। यह ग्रंथ पाठकों को मानसिक व शारीरिक आरोग्यता प्रदान करने में प्रबल निमित्त है।

एक हजार आठ

एक हजार आठ

Hindi

आचार्य गुरुवर श्री वसुनन्दी जी मुनिराज द्वारा रचित प्रस्तुत कृति "एक हज़ार आठ" सद्वाक्यों का पुष्प पुंज है जिसके अध्ययन से चित्त में रत्नत्रय का दिव्य प्रकाश स्वतः ही प्रसारित होता है। छोटे-छोटे सूत्र बड़े-बड़े दुर्गम मार्ग से निकलने के लिए दिशा सूचक यंत्र के समान हैं। भव्य जीवन के लिए ये सूत्र वाक्य या सुभाषित प्रवचन आदि वक्तव्यों में उपयोग होने पर उन्हे प्रभावशाली बनाएंगे।

कणगकुमार-चरियं (कनककुमार चरित्र)

कणगकुमार-चरियं (कनककुमार चरित्र)

Prakrit
कम्म-सहावो (कर्म स्वभाव)

कम्म-सहावो (कर्म स्वभाव)

Prakrit

आचार्य भगवन् श्री वसुनन्दी जी मुनिराज द्वारा कर्म के मूल भेद, उत्तर भेद और प्रकृति, प्रदेश, स्थिति एवम् अनुभाग इन 4 प्रकार के बंधनों का कथन 597 गाथाओं में निबद्ध इस "कम्म-सहावो" (कर्म स्वभाव) नामक प्राकृत ग्रन्थ में किया गया है।किन कर्मों का बंध किन कारण और प्रत्ययों से होता है इसका कथन इस सिद्धांत ग्रंथ में बहुत ही विशेष रूप से किया गया है जो निश्चय ही भावभीरुता और सम्यक् बोध का कारण है।

करकण्डु चरित्र (मुनि श्री कनकामर जी)

करकण्डु चरित्र (मुनि श्री कनकामर जी)

Hindi

प्रस्तुत ग्रंथ "करकण्डु चरित्र" कर्म व भावों के फल को राजा करकण्डु के माध्यम से प्रस्तुत करता है। इस ग्रंथ में पूर्व भव में किए पाप और पुण्य के फल का चित्र देख सकते हैं। इस ग्रंथ की रचना मुनि श्री कनकामर जी द्वारा संभवत: ईस्वी सन् 965 के पूर्व में हो चुकी थी।

कर्म विजेता (जिनसहस्रनाम विधान)

कर्म विजेता (जिनसहस्रनाम विधान)

Hindi
कर्म विपाक (आ. श्री सकलकीर्ति जी)

कर्म विपाक (आ. श्री सकलकीर्ति जी)

Sanskrit
कर्मक्षय विधान

कर्मक्षय विधान

Hindi
कर्मप्रकृति (सिद्धांतचक्रवर्ती आ. श्री अभयचंद्र जी)

कर्मप्रकृति (सिद्धांतचक्रवर्ती आ. श्री अभयचंद्र जी)

Sanskrit

सिद्धांत चक्रवर्ती आचार्य श्री अभयचंद्र जी द्वारा रचित प्रस्तुत कृति "कर्म प्रकृति" में बंध आदि विषयों का वर्णन सरल, सुबोध और सहज भाषा में किया गया है। प्रारंभिक अध्येता या विद्यार्थी विशेष सहयोग के बिना भी इसमें स्वयं प्रवेश पा सकते हैं। संस्कृत भाषा का साधारण जानकार भव्य जीव भी इस कृति से जैन धर्म के सिद्धांतों की पर्याप्त जानकारी प्राप्त कर सकता है।

कलम पट्टी बुद्धिका

कलम पट्टी बुद्धिका

Hindi

प्रस्तुत कृति "कलम पट्टी बुद्धिका" में पूज्य आचार्य श्री वसुनन्दी जी मुनिराज ने अल्प ज्ञानियों एवं बच्चों को ध्यान में रखते हुए सरल और सुगम प्रश्नों के माध्यम से जिनशासन का सार एकत्रित कर रचा है। बालकों के जीवन को सुखद और शांति पूर्ण बनाने के लिए माता के समान इस कृति को आंका जा सकता है। ये पुस्तक व्यक्ति और सृष्टि के चरम और परम विकास में सुसमर्थ कारण आध्यात्मिक विद्या के निमित्त भूत है।

कला-विण्णाणं (कला विज्ञान)

कला-विण्णाणं (कला विज्ञान)

Prakrit

मनुष्य में अभिव्यक्ति की अदम्य इच्छा होती है। वह जिन संस्कारों से लालित-पालित होता है उन्हीं को अपने व्यवहार में प्रकट करता है। लेखन, पठन, संगीत, वाणी आदि के माध्यम से उस व्यक्ति का सम्पूर्ण व्यक्तित्व सहज ही ज्ञात हो जाता है। परम पूज्य आचार्य भगवन् श्री वसुनंदी जी महाराज द्वारा रचित 372 गाथाओं में निबद्ध प्रस्तुत "कला-विण्णाणं" (कला विज्ञान) नामक ग्रंथ में पुरुषों की 72 व स्त्रियों की 64 कलाओं का वर्णन किया गया है। कला से युक्त जीवन स्वपर के लिए वरदान स्वरूप होता है।

कलिकुण्ड पार्श्वनाथ विधान

कलिकुण्ड पार्श्वनाथ विधान

Hindi

परम पूज्य आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज ने भगवान् श्री पार्श्वनाथ की पूजा और विशिष्ट अर्घों के साथ 4 वलयों के द्वारा यह विधान लिखा है। कलिकुंड का अर्थ सर्वकलेश, कलह समूह का नाश करने वाला है। प्रस्तुत पुस्तक भव्य जीवों के चित्त को आह्लादित और विशुद्ध करने का मंगलमय साधन है।

कल्पद्रुम विधान

कल्पद्रुम विधान

Hindi
कल्याण मंदिर विधान

कल्याण मंदिर विधान

Hindi
कल्याण मन्दिर विधान

कल्याण मन्दिर विधान

Hindi
कल्याणी

कल्याणी

Hindi

आचार्य श्री वसुनन्दी जी मुनिराज द्वारा रचित प्रस्तुत कृति "कल्याणी" में आगम, आध्यात्म, सिद्धांत, चरणानुयोग, रीति-रिवाज, सामाजिक नीतियाँ और मानवीय कर्तव्यों के सरल पद्य हैं। प्रत्येक पद्य के अंत में कल्याणी शब्द का प्रयोग हुआ है। प्रस्तुत कृति में पद्य की योजना अपने आप में सर्वोपरी है, मोदक की तरह से सुखद और आनंद प्रदायक है। इस कृति को पूज्य श्री ने मात्र एक ही दिन रात में सृजन किया है जो हर वर्ग के व्यक्ति के लिए उसकी योग्यतानुसार ग्राह्य है।

कुरल काव्य (संत तिरुवल्लुवर)

कुरल काव्य (संत तिरुवल्लुवर)

Hindi
को विवेगी (विवेकी कौन)

को विवेगी (विवेकी कौन)

Prakrit

मनुष्य की शालीनता के तीन उपस्तम्भ हैं - समाज, संस्कृति व सभ्यता। विवेकवान् व्यक्ति ही इन क्षेत्रों में अपने व्यक्तित्व को उद्भासित कर सकता है। विवेकी व्यक्ति ही समाज का प्रिय, यशस्वी और तिलकायित बनता है। आचार्य श्री वसुनंदी जी महाराज द्वारा रचित यह "को विवेगी" नामक प्राकृत ग्रन्थ संस्कृति, सभ्यता का पोषक व संवाहक है। 84 गाथाओं के माध्यम से विवेकी व्यक्ति के लक्षणों का कथन करने वाला यह अनुपम ग्रंथ है।

कोटिभट श्रीपाल चरित्र (आ. श्री सकलकीर्ति जी)

कोटिभट श्रीपाल चरित्र (आ. श्री सकलकीर्ति जी)

Hindi