403 ग्रंथ
श्री चंद्रप्रभ विधान
परम पूज्य आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज द्वारा रचित प्रस्तुत "चन्द्रप्रभ विधान" श्रद्धा शिरोमणि श्री चन्द्रप्रभ भगवान के मूलगुणों की स्तुति हेतु रचा गया है। इस विधान में कुल 128 अर्घ्य हैं। प्रस्तुत कृति भव्य श्रावकों के सर्व मनोरथों को पूर्ण करने वाली है, भव दुःखों का अंत करने में समर्थ है। इस विधान में 8 वलय हैं, जिसमें पांच कल्याणकों के, सोलह स्वप्नों के फलों के, चौंतीस अतिशयों के, मुनिराज के 28 मूलगुणों के, बारह तप, दस धर्म व तीन गुप्तियों के, अष्ट प्रातिहार्य, अनंत चतुष्टय के व सिद्धों के अष्ट मूलगुणों के अर्घ हैं। यह विधान श्रावकों के लिए विधेय है।
श्री चंद्रप्रभ विधान (देहरा तिजारा)
श्री चौबीसी महार्चना
श्री जम्बूस्वामी जी चरित्र (श्री वीर कवि)
जम्बूस्वामी चरित्र श्री वीर कवि द्वारा रचित प्रस्तुत ग्रन्थ अंतिम अनुबद्ध केवली श्री जम्बूस्वामी जी पर आधारित है जिसमें उनके जीवन में उतर-चढ़ाव को सरल और अलंकारों से युक्त विशेषणों से दर्शाया है। जम्बूस्वामी और उनकी पत्नियों की कथा रूप में जो वार्ताएं हैं वे भव भिरुओं को वैराग्यवर्धक और रागियों को संसार का कारण हैं। ग्रंथ की शैली उपन्यास की तरह अत्यंत रोचक, तत्त्वबोध युक्त है जो वैराग्य का प्रबल निमित है।
श्री जम्बूस्वामी विधान
श्री जिनसहस्त्रानाम विधान (लघु) आदि एक नाम अनेक
श्री जिनसहस्रनाम एवं पंचपरमेष्ठी विधान
श्री नंदीश्वर विधान
श्री नेमिनाथ विधान
श्री पंचमेरू विधान
श्री पद्मप्रभ विधान
श्री पुष्पदंत विधान
श्री भक्तामर विधान
श्री महावीर विधान
श्री शांति-कुंथु-अर-विधान
श्री शांतिनाथ विधान
श्री शान्तिनाथ विधान
श्री संभवनाथ विधान
श्री समवशरण महार्चना
श्री सम्मेदशिखर विधान
श्री सर्वतोभद्र महार्चना
इस भक्ति के महोदधि स्वरूप "सर्वतोभद्र महार्चना" की रचना आचार्य श्री वसुनन्दी जी मुनिराज द्वारा केवल 15 दिन में चातुर्मास के दौरान तारंगा जी सिद्ध क्षेत्र में की गई। 92 छंदों में निबद्ध इस महार्चना में 84 पूजा, 1902 अर्घ्य और 86 पूर्ण अर्घ्य हैं। विधान में 3 लोक के समस्त चैत्य, चैत्यालयों की भक्ति के साथ इसमें सिद्धांत भी दृष्टिगोचर होता है।यह विधान बहुत चमत्कारी है। इसे विशेष पर्व, दिन आदि में करना ही चाहिए।
