403 ग्रंथ
मीठे प्रवचन (भाग 1-9)
प्रस्तुत कृति "मीठे प्रवचन भाग-1" में सरल और मधुर, सटीक उदाहरणों और नई सोच से युक्त प्रवचनांश हैं जिन्हें पढने से न केवल धार्मिक ज्ञानार्जन होता है अपितु सामाजिक ज्ञान भी वृद्धिंगत होता है। यह जैन-जैनेतर समाज के लिए बहुपयोगी कृति है। इसमें लिखे मीठे प्रवचनों के अंश मानव को धर्म की प्रेरणा देने वाले हैं। इसके 6 भाग उपलब्ध हैं।
मीठे प्रवचन भाग-2
प्रस्तुत कृति "मीठे प्रवचन भाग-2" में सरल और मधुर, सटीक उदाहरणों और नई सोच से युक्त प्रवचनांश हैं जिन्हें पढने से न केवल धार्मिक ज्ञानार्जन होता है अपितु सामाजिक ज्ञान भी वृद्धिंगत होता है। यह जैन-जैनेतर समाज के लिए बहुपयोगी कृति है। इसमें लिखे मीठे प्रवचनों के अंश मानव को धर्म की प्रेरणा देने वाले हैं। इसके 6 भाग उपलब्ध हैं।
मीठे प्रवचन भाग-3
प्रस्तुत कृति "मीठे प्रवचन भाग-3" में सरल और मधुर, सटीक उदाहरणों और नई सोच से युक्त प्रवचनांश हैं जिन्हें पढने से न केवल धार्मिक ज्ञानार्जन होता है अपितु सामाजिक ज्ञान भी वृद्धिंगत होता है। यह जैन-जैनेतर समाज के लिए बहुपयोगी कृति है। इसमें लिखे मीठे प्रवचनों के अंश मानव को धर्म की प्रेरणा देने वाले हैं। इसके 6 भाग उपलब्ध हैं।
मीठे प्रवचन भाग-4
प्रस्तुत कृति "मीठे प्रवचन भाग-4" में सरल और मधुर, सटीक उदाहरणों और नई सोच से युक्त प्रवचनांश हैं जिन्हें पढने से न केवल धार्मिक ज्ञानार्जन होता है अपितु सामाजिक ज्ञान भी वृद्धिंगत होता है। यह जैन-जैनेतर समाज के लिए बहुपयोगी कृति है। इसमें लिखे मीठे प्रवचनों के अंश मानव को धर्म की प्रेरणा देने वाले हैं। इसके 6 भाग उपलब्ध हैं।
मीठे प्रवचन भाग-5
प्रस्तुत कृति "मीठे प्रवचन भाग-5" में सरल और मधुर, सटीक उदाहरणों और नई सोच से युक्त प्रवचनांश हैं जिन्हें पढने से न केवल धार्मिक ज्ञानार्जन होता है अपितु सामाजिक ज्ञान भी वृद्धिंगत होता है। यह जैन-जैनेतर समाज के लिए बहुपयोगी कृति है। इसमें लिखे मीठे प्रवचनों के अंश मानव को धर्म की प्रेरणा देने वाले हैं। इसके 6 भाग उपलब्ध हैं।
मीठे प्रवचन भाग-6
प्रस्तुत कृति "मीठे प्रवचन भाग-6" में सरल और मधुर, सटीक उदाहरणों और नई सोच से युक्त प्रवचनांश हैं जिन्हें पढने से न केवल धार्मिक ज्ञानार्जन होता है अपितु सामाजिक ज्ञान भी वृद्धिंगत होता है। यह जैन-जैनेतर समाज के लिए बहुपयोगी कृति है। इसमें लिखे मीठे प्रवचनों के अंश मानव को धर्म की प्रेरणा देने वाले हैं।
मीठे स्वर
मुक्ति का वाग्दान (इष्टोपदेश)
मुक्ति दूत के मुक्तक
मूल-वण्णो (मूल वर्ण)
आचार्य श्री वसुनन्दी जी मुनिराज द्वारा रचित प्रस्तुत प्राकृत ग्रंथ "मूल- वण्णो (मूल वर्ण) 84 गाथाओं में निबद्ध है। शब्द भावों की अभिव्यक्ति का कारण हैं। वर्णों से शब्द, शब्द से पद और पदों से वाक्यों का निर्माण होता है। ये वर्ण मूलतः 64 हैं, 64 वर्णों और वर्ण की पृथक्-पृथक् शक्तियों का कथन करने वाला यह अद्भुत ग्रंथ है।
मूलाचार प्रदीप (आ. श्री सकलकीर्तिस्वामी जी)
मृत्यु महोत्सव
मे भावना (मेरी भावना)
मौनव्रत कथा (आ. श्री श्रीचंद्र स्वामी जी)
यशोधर चरित्र
यशोधर महाराज जिन्होंने आटे के मुर्गे की बलि दी। इस भाव हिंसा के कारण एवं मातृमोह के कारण सुदीर्घ काल तक नाना कुयोनियों में भ्रमण करते हुए शब्दातीत दुःखों को प्राप्त किया पुनः वे अभयकुमार एवं उनकी मां का जीव अभयमति के रूप में उत्पन्न हुए, मुनिराज से अपने पूर्व जन्म का वृतांत सुन विरक्त हो क्षुल्लक क्षुल्लिका बने बाद में उन्होंने अपने मामा को उपदेश देकर जैनधर्म में अनुरक्त कराया। यह शास्त्र आबालवृद्धों के लिए पठनीय है एवं हिंसादि पापों से विरक्ति का प्रेरक है।
यागमंडल विधान
प्रस्तुत कृति "यागमंडल विधान एवं पंचकल्याणक पूजा" में परम पूज्य आचार्य श्री वसुनन्दी जी मुनिराज की लेखनी से प्रसूत भक्ति से समन्वित अद्भुत रचना है। पंचकल्याणक प्रतिष्ठा, वेदी प्रतिष्ठा, कलशारोहण, दीक्षा आदि कार्यों में इस विधान को ही संपन्न किया जाता है। इस विधान में शब्दों का निर्माण, छंद आदि लयबद्ध तरीके से सरल, सहज अर्थपूर्ण ढंग से किया गया है, जिसे पढ़कर भव्य प्राणी सहज भक्ति सागर में सराबोर हो जाते हैं। सभी सातिशय पुण्यार्जन करें इसी अभिलाषा से प्रस्तुत कृति का प्रकाशन किया गया है।
योगसार (भाग 1, 2) (आचार्य श्री अमितगति जी)
योगामृत (भाग 1-2) (मुनि श्रीबालचन्द्र जी)
रक्षाबंधन विधान
रट्टु-संति-महाजण्णो (राष्ट्र शांति महायज्ञ)
राष्ट्र में निर्मित प्रशस्त राजपथ व उत्तुंग इमारतें राष्ट्र में सुख-शांति की स्थापना करने में संभव नहीं। राष्ट्र की पहचान उसमें विचरण करने वाले आचारवान् मनुष्यों से है। सुरभित करने वाले पुष्पों से रहित उपवन महत्वहीन ही प्रतीत होता है, अतः राष्ट्र रूपी उपवन को पुनः महकाने हेतु, उसमें सुख-शांति की स्थापना हेतु विभिन्न पदासीन व्यक्तियों के कर्तव्य व महत्वपूर्ण घटकों का वर्णन परम पूज्य आचार्य भगवन् श्री वसुनंदी जी महाराज ने रट्ठ-संति-महाजण्णो (राष्ट्र शांति महायज्ञ) नामक इस ग्रन्थ के अन्तर्गत किया है।
रत्नकरण्ड श्रावकाचार (श्रावकधर्म-संहिता)
रत्नत्रय विधान
रयणकंडो (प्राकृत सूक्ति कोश)
प्रस्तुत ग्रंथ "रयणकंडो" (प्राकृत सूक्ति कोश) में लगभाग 600 विषयों पर प्राकृत, हिंदी और अंग्रेजी भाषा की लोकोपयोगी 3333 सूक्तियों का अनुपम लेखन संपूर्ण मानव जाति के लिए कल्याणकारी और आबालवृद्ध और विद्वान् से जनसामान्य तक सभी के लिए सुबोध इस ग्रंथ में अकारादि क्रम से नैतिक, सामाजिक, राजनैतिक, भौगोलिक, ज्योतिष, वास्तु आदि विषयों पर भी जीवन निर्माण के सूत्र प्रदान किए गए हैं।
रयणसार (आ. श्री कुंदकुंद स्वामी)
प्रस्तुत "रयणसार" ग्रन्थ में आचार्य कुंदकुंद देव द्वारा ध्यान, चर्या आदि को 167 गाथाओं के माध्यम से रचा गया है। सरल चिंतन युक्त हिंदी भाषा में प्राकृत गाथाओं को अनुवादित किया गया है। श्रावक और श्रमण दोनों के धर्मों का संक्षेप में अति उत्तम तरीके से कथन किया है।
