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साहित्य

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94 ग्रंथ

पासणाह-चरियं (पार्श्वनाथ चरित्र)

पासणाह-चरियं (पार्श्वनाथ चरित्र)

Prakrit
पुण्णासव-णिलयो (पुण्यास्रव निलय)

पुण्णासव-णिलयो (पुण्यास्रव निलय)

Prakrit

नि:कांक्ष भाव से किया गया पुण्य अरिहंत पद को देने में समर्थ होता है। प्रस्तुत ग्रन्थ "पुण्णासव- णिलयो"(पुण्यास्रव निलय) आचार्य श्री वसुनंदी जी महाराज द्वारा रचित 228 गाथाओं में निबद्ध है। ग्रंथ की प्रत्येक गाथा पुण्य की प्रेरिका है। यह पुण्य की छांव में ले जाने में समर्थ है। पापों से भीति व पुण्य में प्रीति उत्पन्न कराने वाला यह अद्भुत ग्रन्थ है।

प्राकृत वाणी भाग-1-5

प्राकृत वाणी भाग-1-5

Prakrit

प्रस्तुत कृति "प्राकृत वाणी भाग-4" आचार्य श्री वसुनंदी जी महाराज द्वारा रचित तीन प्राकृत ग्रंथों का संग्रह है। जिसमें "पसम भावो", " लोगुत्तर वित्ती" एवं "अशोक रोहिणी चरित्र " नामक ग्रंथ संकलित हैं। प्राकृत वाणी के प्रथम भाग में 12 , द्वितीय भाग में 9 , तृतीय भाग में 7 प्राकृत ग्रंथ संकलित हैं।

प्राकृत वाणी भाग-5

प्राकृत वाणी भाग-5

Prakrit
भत्तामर-थोत्तं (भक्तामर स्तोत्र)

भत्तामर-थोत्तं (भक्तामर स्तोत्र)

Prakrit
भत्तिगुच्छो (भक्ति गुच्छ)

भत्तिगुच्छो (भक्ति गुच्छ)

Prakrit
भाव-सारो (भाव सार)

भाव-सारो (भाव सार)

Prakrit

प्रस्तुत ग्रंथ "भाव -सारो" प्राकृतभाषा चक्रवर्ती, अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोगी आचार्य श्री "वसुनंदी जी" मुनिराज द्वारा प्राकृत भाषा में रचित है। इसमें आचार्य भगवन् ने २२८ गाथाओं में भावों का विस्तृत व रोचक वर्णन किया है। यह ग्रंथ पाठकों की विशुद्धि व भाव परिवर्तन में उत्कृष्ट निमित्त है।

मंगल-सुत्तं (मंगल सूत्र)

मंगल-सुत्तं (मंगल सूत्र)

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आचार्य श्री वसुनन्दी जी मुनिराज द्वारा रचित प्रस्तुत प्राकृत ग्रंथ "मंगल-सुत्तं" (मंगल सूत्र) 111 गाथाओं में निबद्ध है। यह ग्रंथ जीवन को मंगल व प्रशस्त करने वाले सूत्रों से युक्त, व्यवहार और निश्चय से युक्त, आध्यात्मिक मंदाकिनी के स्वरूप का परिज्ञान कराने वाला है।

मइथिली-सुत्तं (मैथिली-सूत्र)

मइथिली-सुत्तं (मैथिली-सूत्र)

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महाणुभावो (महानुभाव)

महाणुभावो (महानुभाव)

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परम पूज्य अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोगी ,प्राकृत भाषा चक्रवर्ती आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज द्वारा रचित "महानुभाव" ग्रंथ प्राकृत की १२६ गाथाओं में निबद्ध है। "महानुभाव" एक संबोधन वाक्य है। वर्तमान में बिगड़ती भाषा शैली एवं बढ़ते असंतुलित शब्दों के प्रयोग को देखते हुए आचार्य श्री ने इस ग्रंथ का लेखन किया। 'महानुभाव' इस एक संबोधन शब्द को उपलक्षण मात्र मानकर यहाँ आचार्य श्री के भाव को इस प्रकार ग्रहण करें, कि सदैव अच्छे संबोधन शब्दों का प्रयोग करें। जो स्व-पर विशुद्धि में कारण होगा। सामने वाले के लिए दिया गया अच्छा संबोधन बदले में आपके लिए शुभ भावनाएं व पुण्य फल लेकर आता है।

मिगधय-चरियं (मृगध्वज चरित्र)

मिगधय-चरियं (मृगध्वज चरित्र)

Prakrit
मूल-वण्णो (मूल वर्ण)

मूल-वण्णो (मूल वर्ण)

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आचार्य श्री वसुनन्दी जी मुनिराज द्वारा रचित प्रस्तुत प्राकृत ग्रंथ "मूल- वण्णो (मूल वर्ण) 84 गाथाओं में निबद्ध है। शब्द भावों की अभिव्यक्ति का कारण हैं। वर्णों से शब्द, शब्द से पद और पदों से वाक्यों का निर्माण होता है। ये वर्ण मूलतः 64 हैं, 64 वर्णों और वर्ण की पृथक्-पृथक् शक्तियों का कथन करने वाला यह अद्भुत ग्रंथ है।

मे भावना (मेरी भावना)

मे भावना (मेरी भावना)

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रट्टु-संति-महाजण्णो (राष्ट्र शांति महायज्ञ)

रट्टु-संति-महाजण्णो (राष्ट्र शांति महायज्ञ)

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राष्ट्र में निर्मित प्रशस्त राजपथ व उत्तुंग इमारतें राष्ट्र में सुख-शांति की स्थापना करने में संभव नहीं। राष्ट्र की पहचान उसमें विचरण करने वाले आचारवान् मनुष्यों से है। सुरभित करने वाले पुष्पों से रहित उपवन महत्वहीन ही प्रतीत होता है, अतः राष्ट्र रूपी उपवन को पुनः महकाने हेतु, उसमें सुख-शांति की स्थापना हेतु विभिन्न पदासीन व्यक्तियों के कर्तव्य व महत्वपूर्ण घटकों का वर्णन परम पूज्य आचार्य भगवन् श्री वसुनंदी जी महाराज ने रट्ठ-संति-महाजण्णो (राष्ट्र शांति महायज्ञ) नामक इस ग्रन्थ के अन्तर्गत किया है।

रयणकंडो (प्राकृत सूक्ति कोश)

रयणकंडो (प्राकृत सूक्ति कोश)

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प्रस्तुत ग्रंथ "रयणकंडो" (प्राकृत सूक्ति कोश) में लगभाग 600 विषयों पर प्राकृत, हिंदी और अंग्रेजी भाषा की लोकोपयोगी 3333 सूक्तियों का अनुपम लेखन संपूर्ण मानव जाति के लिए कल्याणकारी और आबालवृद्ध और विद्वान् से जनसामान्य तक सभी के लिए सुबोध इस ग्रंथ में अकारादि क्रम से नैतिक, सामाजिक, राजनैतिक, भौगोलिक, ज्योतिष, वास्तु आदि विषयों पर भी जीवन निर्माण के सूत्र प्रदान किए गए हैं।

रुम्मिणी-चरियं (रुक्मिणी चरित्र)

रुम्मिणी-चरियं (रुक्मिणी चरित्र)

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लक्खण-गंथो (लक्षण-ग्रंथ)

लक्खण-गंथो (लक्षण-ग्रंथ)

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लक्खमणा-चरियं (लक्ष्मणा चरित्र)

लक्खमणा-चरियं (लक्ष्मणा चरित्र)

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लेस्सा-सारो (लेश्या सार)

लेस्सा-सारो (लेश्या सार)

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लोगुत्तरविट्टी (लोकोत्तर वृत्ति)

लोगुत्तरविट्टी (लोकोत्तर वृत्ति)

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प्रस्तुत कृति "लोकोत्तर वृत्ति" आचार्य श्री वसुनंदी जी महाराज द्वारा प्राकृत भाषा में रचित है। 93 गाथाओं में निबद्ध वृहद् अर्थ को समाहित किए हुए यह एक लघुकाय ग्रंथ है। इसमें योगियों की अलौकिक प्रवृत्ति का वर्णन है।

वय-कहा-कोसो (व्रत कथा कोश)

वय-कहा-कोसो (व्रत कथा कोश)

Prakrit
वयण-पमाणत्तं (वचन प्रमाणत्व)

वयण-पमाणत्तं (वचन प्रमाणत्व)

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नय प्रमाणादि के द्वारा ही वस्तु तत्व का सम्यक् अवबोध संभव है। इन्हीं नयादि के द्वारा परीक्षण कर तत्वों का ग्रहण करना चाहिए। आचार्य श्री वसुनंदी जी महाराज द्वारा रचित प्रस्तुत 543 गाथाओं में निबद्ध "वयण-पमाणत्तं" नामक ग्रंथ न्याय रूपी दुर्ग में प्रवेश हेतु तोरणद्वार ही है। द्रव्य के लक्षण, गुण, पर्याय, स्वभाव, प्रमाण, नयादि का विवेचन करने वाला यह ग्रन्थ पठनीय व स्मरणीय है।

विज्जा-वसु-सावयायारो (विद्यावसु श्रावकाचार)

विज्जा-वसु-सावयायारो (विद्यावसु श्रावकाचार)

Prakrit
विणयसारो (विनय सार)

विणयसारो (विनय सार)

Prakrit

प्रस्तुत ग्रंथ "विणय- सारो" विनय सार परम पूज्य प्राकृतभाषा चक्रवर्ती , अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोगी "आचार्य श्री वसुनंदी जी" मुनिराज द्वारा 192 अनुष्टुप् छन्दों में प्राकृत भाषा में निबद्ध है। इसमें विनय के लक्षण, भेद आदि बताते हुए विनय के सम्पूर्ण विषय का गहन और सूक्ष्म वर्णन किया गया है।